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सफेदपोश डकैती: सरकारी अस्पताल में ‘कमीशन’ का ऐसा नंगा नाच, शर्मसार हुई मानवता!

मरीजों के हक पर डाका: सरकारी लैब को 'अंगूठा', प्राइवेट चहेतों पर लुटाए सरकारी खजाने के करोड़ों।

अजीत मिश्रा (खोजी)

🏥सत्ता की ओट में ‘महाभारत’: महिला अस्पताल में नैतिकता का चीरहरण और करोड़ों का ‘कमीशन-खेल’🏥

😇अस्पताल या लूट का अड्डा? सीएमएस और बाबू की जुगलबंदी ने 100 बेड वाले अस्पताल को बनाया ‘भ्रष्टाचार का केंद्र’।

😇कलयुग का महाभारत: जहाँ सीएमएस बनीं ‘धृतराष्ट्र’ और बाबू की भूमिका ‘दुर्योधन’ जैसी!

😇सत्ता का चीरहरण: जब रक्षक ही बन गए भक्षक, कौन बचाएगा हरैया अस्पताल की साख?

😇अंधा कानून, अंधी व्यवस्था: भ्रष्ट ठेकेदार के मोह में अंधी हुई सीएमएस, सरकारी नियमों की दी बलि।

विशेष रिपोर्ट: बस्ती ब्यूरो

बस्ती जनपद का 100 बेड वाला महिला अस्पताल (एमजीएच), हरैया इन दिनों स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के एक ऐसे ‘महाभारत’ के लिए चर्चा में है जहाँ नैतिकता और ईमानदारी को धृतराष्ट्र की तरह अंधा बना दिया गया है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और अस्पताल को ‘लूट की दुकान’ बना दिया जाए, तो सवाल केवल एक अधिकारी पर नहीं, बल्कि समूची व्यवस्था की साख पर खड़ा होता है।

🔥सुषमा जायसवाल: ‘धृतराष्ट्र’ की भूमिका में मौन स्वीकृति?

अखबार की सुर्खियां और जनचर्चा चीख-चीख कर कह रही हैं कि यदि सीएमएस सुषमा जायसवाल को इस भ्रष्टाचार की पटकथा का ‘धृतराष्ट्र’ मान लिया जाए, जो पुत्र-मोह (यहाँ भ्रष्टाचार और कमीशन मोह) में अंधी होकर सब कुछ देख कर भी अनदेखा कर रही हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक महिला अधिकारी से समाज जिस संवेदनशीलता और शुचिता की अपेक्षा करता है, उसे सीएमएस ने चंद रुपयों और ‘शुभम अग्रवाल’ जैसे भ्रष्ट ठेकेदारों के गठजोड़ के लिए ताक पर रख दिया है।

⚡80 लाख का ‘रीजेंट’ या भ्रष्टाचार का तेल? बिना मरीजों के आखिर किसे बांटी गई सरकारी रेवड़ियां?

⚡साहब! ये अस्पताल है या कमीशन की दुकान? चहेते ठेकेदार को उपकृत करने के लिए तोड़े गए सारे नियम।

⚡विधायक जी मौन क्यों? जनता की गाढ़ी कमाई लूटी जा रही और जनप्रतिनिधि साधे बैठे हैं चुप्पी!

🔥बाबू बजरंग प्रसाद: व्यवस्था का ‘दुर्योधन’

इस पूरे खेल का असली सूत्रधार बाबू बजरंग प्रसाद को बताया जा रहा है। अस्पताल की फाइलें सरकारी नियमों से नहीं, बल्कि बाबू के इशारों पर नाचती हैं। आरोप है कि बाबू की ‘कलम’ तभी चलती है जब कमीशन का वजन भारी होता है। पत्रकारों के लिफाफों से लेकर ठेकेदारों के भुगतान तक, बाबू की भूमिका किसी ‘अहंकारी दुर्योधन’ जैसी है जो नियमों को अपने पैरों तले कुचलने का माद्दा रखता है।

🔥सरकारी लैब की अनदेखी और ‘प्राइवेट’ प्रेम का गणित

इस भ्रष्टाचार की सबसे तीखी परत वह है जहाँ सरकारी लैब (पीओ सिटी) को हाशिए पर धकेल दिया गया।

👉तथ्य 1: सरकारी लैब को साल भर में मात्र 9.50 लाख का भुगतान किया गया क्योंकि वे ‘चाय तक नहीं पिलाते’ (यानी कमीशन नहीं देते)।

👉तथ्य 2: इसके विपरीत, भ्रष्टाचार की उपज ‘पीओसीएल’ नामक प्राइवेट लैब को 80 लाख का भारी-भरकम फर्जी भुगतान कर दिया गया।

👉तथ्य 3: नियम ताक पर रखकर बिना सरकारी अनुमति के प्राइवेट लैब को अस्पताल के भीतर स्थापित करवाया गया।

यह सीधे तौर पर सरकारी खजाने की डकैती है। जब अस्पताल में मरीजों की संख्या कम थी, तो आखिर 80 लाख रुपये का ‘रीजेंट’ किसके लिए खरीदा गया? क्या यह कागजी खरीद केवल अधिकारियों और ठेकेदारों की जेब भरने का जरिया थी?

🔥जनप्रतिनिधियों की रहस्यमयी चुप्पी

इस पूरे प्रकरण में स्थानीय विधायक और जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी कटघरे में है। यदि वे सजग होते, तो जनता के टैक्स का पैसा इस तरह बंदरबांट न होता। 29 मार्च को आनन-फानन में 89 लाख का भुगतान हो जाना और किसी का उफ़ तक न करना, यह मिलीभगत की ओर इशारा करता है।

🔥 जेल है असली जगह

स्वास्थ्य जैसे पवित्र सेवा क्षेत्र में जो अधिकारी और कर्मचारी ‘कमीशन की मलाई’ चाट रहे हैं, उन्हें सरकारी दफ्तरों में बैठने का कोई हक नहीं है। जिस महिला अस्पताल को गरीब माताओं-बहनों की सेवा के लिए बनाया गया था, उसे सीएमएस और बाबू ने अपनी जागीर समझ लिया है।

हमारा स्पष्ट मत है: ऐसे भ्रष्ट चेहरों के खिलाफ केवल जांच नहीं, बल्कि कठोर बर्खास्तगी और रिकवरी की कार्रवाई होनी चाहिए। जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों का ठिकाना अस्पताल का आलीशान कमरा नहीं, बल्कि जेल की सलाखें होनी चाहिए।

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